मां दुर्गा की पूजा और बेटियों की चीखें: आखिर कैसी है हमारी शक्ति-उपासना?
नौ दिन मां के जयकारे, बाकी दिन बेटियों की असुरक्षा! क्या हमारी आस्था केवल पंडालों तक सिमटकर रह गई है?


आज से शारदीय नवरात्र और दुर्गापूजा का शुभारंभ हो रहा है। घरों में कलश स्थापित होंगे, मंदिरों में घंटे-घड़ियाल गूंजेंगे, दुर्गा पंडाल सजेंगे और मां के जयकारों से वातावरण गुंजायमान होगा। कोई मां से सुख मांगेगा, कोई समृद्धि, कोई संतान की खुशहाली तो कोई अपने परिवार की रक्षा का आशीर्वाद।
लेकिन इस भक्ति और उल्लास के बीच एक सवाल ऐसा भी है, जिससे आंखें चुराना हमारी आस्था के साथ सबसे बड़ा छल होगा।


जिस देश में मां दुर्गा को शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप मानकर पूजा जाता है, उसी देश में किसी बेटी के साथ बलात्कार होता है, किसी महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, किसी बच्ची की मासूमियत को दरिंदगी कुचल देती है और किसी बहन को अपनी गरिमा बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है—तो आखिर हमारी शक्ति-उपासना का अर्थ क्या रह जाता है?
क्या मां दुर्गा की आराधना केवल नौ दिनों का धार्मिक अनुष्ठान है? क्या नारी का सम्मान केवल देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाने तक सीमित है? क्या हमारे लिए स्त्री तभी पूजनीय है, जब वह पत्थर की प्रतिमा में हो, और वही स्त्री जब जीवित मनुष्य के रूप में हमारे सामने खड़ी हो, तब उसके अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान को कुचल दिया जाए?
ये सवाल असहज जरूर हैं, लेकिन आज इन्हें पूछना जरूरी है।
आंकड़े जो हमारी आस्था के सामने आईना रखते हैं
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की क्राइम इन इंडिया-2023 रिपोर्ट के मुताबिक, देश में वर्ष 2023 के दौरान महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,48,211 मामले दर्ज किए गए। यानी औसतन प्रतिदिन लगभग 1,228 मामले। वर्ष 2022 में यह संख्या 4,45,256 थी।
इसी रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में बलात्कार के 29,670 मामले दर्ज हुए। महिलाओं के अपहरण और बहला-फुसलाकर ले जाने के 88,605 मामले सामने आए, जबकि पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 1,33,676 मामले दर्ज किए गए।
बच्चों के खिलाफ अपराध भी कम भयावह नहीं हैं। NCRB के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराध के कुल 1,77,335 मामले दर्ज हुए। इनमें यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने वाले पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत 67,694 मामले शामिल थे।
इन आंकड़ों को पढ़ते हुए एक बात समझना जरूरी है। ये केवल पुलिस तक पहुंचे और दर्ज हुए मामले हैं। इन्हें देश में हुई हर घटना की पूरी संख्या नहीं माना जा सकता। बहुत-सी पीड़िताएं सामाजिक बदनामी, पारिवारिक दबाव, धमकी और न्याय मिलने की अनिश्चितता के कारण शिकायत दर्ज नहीं करा पातीं।
और हर आंकड़े के पीछे एक इंसान है—एक बेटी, एक बहन, एक मां; एक परिवार, जिसका भरोसा टूटा; एक बच्चा, जिसका बचपन छिन गया।
आंकड़े हमें अपराध का आकार बताते हैं, लेकिन पीड़ित के दर्द की पूरी गहराई नहीं बता सकते।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अपराध करने वाला व्यक्ति किस मानसिकता से पैदा होता है? वह कौन-सी सामाजिक व्यवस्था है, जो एक स्त्री को मनुष्य के बजाय अपनी इच्छा की वस्तु समझने की हिम्मत देती है?
देवी के नौ रूपों की पूजा, लेकिन जीवित स्त्री का अपमान!
दुर्गापूजा हमें नारी की शक्ति, साहस, करुणा और सृजनशीलता का स्मरण कराती है। मां दुर्गा का स्वरूप अन्याय के सामने झुकने का नहीं, बल्कि अन्याय का प्रतिरोध करने का प्रतीक है। महिषासुर के वध की कथा का व्यापक सांस्कृतिक संदेश यही है कि जब अहंकार, अत्याचार और अनियंत्रित शक्ति समाज को रौंदने लगें, तब उनका प्रतिरोध आवश्यक हो जाता है।
लेकिन आज हमारे सामने एक विचित्र विडंबना है।
मां दुर्गा के हाथों में अस्त्र देखकर हम गर्व से भर जाते हैं, लेकिन अपनी बेटी को आत्मरक्षा और आत्मनिर्भरता का अधिकार देने में संकोच करते हैं। पंडालों में कन्या-पूजन करते हैं, लेकिन घर में बेटी के जन्म पर मायूसी छा जाती है। देवी के सम्मान में भव्य आयोजन करते हैं, लेकिन घर की महिलाओं की राय को महत्व नहीं देते। मां की प्रतिमा के आगे माथा टेकते हैं, लेकिन किसी महिला के साथ हो रहे अपमान पर चुप रह जाते हैं।
यह कैसी भक्ति है?
यह कैसा धर्म है, जिसमें प्रतिमा के वस्त्र और आभूषण की चिंता तो है, लेकिन जीवित स्त्री की सुरक्षा, शिक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान की चिंता नहीं?
यह कैसी संस्कृति है, जो नारी को देवी कहने में गर्व महसूस करती है, मगर उसे बराबरी का मनुष्य मानने में हिचकती है?
सच तो यह है कि नारी को देवी कह देना पर्याप्त नहीं है; उसे मनुष्य होने के पूरे अधिकार देना जरूरी है। उसे किसी आसन पर बैठाकर पूजने से अधिक जरूरी है कि उसे अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर दिया जाए। उसे आरती दिखाने से अधिक जरूरी है कि उसकी आवाज सुनी जाए। उसे चुनरी ओढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे भयमुक्त जीवन दिया जाए।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य की लेखनी हमें क्या सिखाती है?
क्रांतिकारी संत, विचारक और युगनिर्माण आंदोलन के प्रवर्तक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने साहित्य में नारी-जागरण, नारी की गरिमा और समाज-निर्माण में उसकी निर्णायक भूमिका पर विशेष बल दिया।
उनकी पुस्तक महिला जागृति में नारी के गौरव और उसकी सृजनशक्ति पर विचार करते हुए यह दृष्टि सामने आती है कि नारी को केवल परिवार की भूमिका तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। वह जीवन, संस्कार, संवेदना, ज्ञान और सामाजिक प्रगति की महत्वपूर्ण वाहक है। आचार्य की लेखनी में नारी के प्रति सम्मान केवल भावुक श्रद्धा नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन में उसकी वास्तविक प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय है।

शक्ति-उपासना के संदर्भ में इस विचार की प्रासंगिकता आज और बढ़ जाती है।
यदि नारी में शक्ति का दर्शन करना है, तो उसकी शिक्षा में शक्ति देखनी होगी। उसके आत्मविश्वास में शक्ति देखनी होगी। उसके निर्णय लेने के अधिकार में शक्ति देखनी होगी। अन्याय के विरुद्ध उसके प्रतिरोध में शक्ति देखनी होगी।
और यदि हम वास्तव में मां दुर्गा के उपासक हैं, तो हमें उस व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा होना होगा जो किसी स्त्री को कमजोर समझकर उसका शोषण करती है।
आचार्य श्रीराम शर्मा के विचारों का मर्म नारी के प्रति श्रद्धा को जीवन-व्यवहार और सामाजिक परिवर्तन में उतारने की प्रेरणा देता है। इसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित कर देना उनके नारी-जागरण के व्यापक दृष्टिकोण को छोटा कर देना होगा।
नारी की पूजा का वास्तविक अर्थ है—उसकी गरिमा की रक्षा, उसकी प्रतिभा का सम्मान और उसके अधिकारों की स्वीकृति।
अपराधी की हवस ही नहीं, समाज की चुप्पी भी कटघरे में है
जब किसी बच्ची के साथ जघन्य अपराध होता है, तो हमारा आक्रोश सड़कों पर उतरता है। मोमबत्तियां जलती हैं, सोशल मीडिया पर आक्रोश उमड़ता है, कड़ी सजा की मांग होती है। कुछ दिनों बाद दूसरी खबर आती है और पहली घटना हमारी सामूहिक स्मृति के किसी कोने में दब जाती है।
लेकिन क्या मोमबत्ती जलाने से जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?
क्या किसी अपराध के बाद कुछ दिनों तक गुस्सा जाहिर कर देना ही न्याय है?
नहीं। न्याय की शुरुआत अपराध के बाद नहीं, उस सामाजिक सोच को बदलने से होती है जो स्त्री को कमतर मानती है और हिंसा को किसी न किसी बहाने सही ठहराने की कोशिश करती है।
जब लड़कियों के कपड़ों को अपराध का कारण बताया जाता है, जब पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठते हैं, जब परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर शिकायत दबाई जाती है, जब आरोपी के प्रभाव और रसूख के सामने पीड़ित परिवार अकेला पड़ जाता है—तब हमें अपने समाज से भी सवाल करना चाहिए।
अपराध की जिम्मेदारी अपराधी की है, पीड़िता की नहीं। किसी लड़की की उम्र, कपड़े, समय, दोस्ती या जीवन जीने का तरीका यौन हिंसा का औचित्य नहीं बन सकता।
कानून का निष्पक्ष और समयबद्ध क्रियान्वयन, पीड़ितों की सुरक्षा, संवेदनशील पुलिस व्यवस्था, गवाहों की हिफाजत और अदालतों में प्रभावी सुनवाई जरूरी हैं। साथ ही, परिवारों और विद्यालयों में बच्चों को सहमति, व्यक्तिगत सीमाओं, समानता और सम्मान की शिक्षा देना भी उतना ही आवश्यक है।
बेटियों को सावधान रहने की शिक्षा दीजिए, लेकिन बेटों को यह भी सिखाइए कि किसी की इच्छा के विरुद्ध उसे छूना, डराना, नियंत्रित करना या अपमानित करना अपराध और अन्याय है।
सुरक्षा का पूरा बोझ बेटियों के कंधों पर डालकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।
इस दुर्गापूजा में एक संकल्प समाज के नाम
इस वर्ष जब हम मां दुर्गा के सामने दीप जलाएं, तो अपने भीतर भी एक दीप जलाएं—विवेक का, संवेदना का और साहस का।
संकल्प लें कि घर में बेटी और बेटे के बीच भेदभाव नहीं करेंगे। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे। किसी महिला के साथ उत्पीड़न देखकर मुंह नहीं मोड़ेंगे। पीड़िता को दोष देने के बजाय उसका साथ देंगे। बच्चों को ऐसे संस्कार देंगे, जिनमें स्त्री के प्रति सम्मान किसी उपदेश का विषय नहीं, बल्कि स्वाभाविक व्यवहार हो।

संकल्प यह भी हो कि अपराध की शिकायत होने पर निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग करेंगे। आरोपित व्यक्ति को बिना न्यायिक प्रक्रिया के दोषी घोषित नहीं करेंगे, लेकिन प्रभावशाली होने के कारण किसी को कानून से ऊपर भी नहीं मानेंगे।
क्योंकि नारी-सम्मान का अर्थ केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि अधिकार, सुरक्षा, समानता और न्याय सुनिश्चित करना है।
अंत में एक सवाल—मां दुर्गा से नहीं, खुद से!
आज से पंडालों में मां दुर्गा की पूजा शुरू होगी और फिर माँ दुर्गा की भव्य प्रतिमाएँ विराजेंगी। उनके चेहरे पर तेज होगा, आंखों में करुणा और हाथों में अन्याय का विनाश करने वाले अस्त्र।
हम हाथ जोड़ेंगे। आरती उतारेंगे। जयकारे लगाएंगे।
लेकिन जब पूजा समाप्त होगी और पंडाल की रोशनी बुझ जाएगी, तब हमारी असली परीक्षा शुरू होगी।
क्या हम अपनी बेटी को बिना भय के घर से निकलने की आजादी दे पाएंगे? क्या हम अपने घर की महिलाओं को बराबरी का अधिकार दे पाएंगे? क्या हम किसी पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए उसके साथ खड़े होंगे? क्या हम अपने भीतर बैठी उस मानसिकता को चुनौती देंगे, जो नारी को कमजोर और पुरुष को स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ मानती है?
अगर इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है, तो हमें अपनी पूजा के स्वरूप पर गंभीरता से विचार करना होगा।
मां दुर्गा की आराधना का अर्थ केवल उनके सामने सिर झुकाना नहीं, बल्कि उस अन्याय के सामने सिर उठाना भी है जो किसी स्त्री की गरिमा को कुचलता है।
जिस दिन किसी बेटी को अपने ही समाज में असुरक्षित महसूस नहीं करना पड़ेगा, जिस दिन किसी महिला को अपने सम्मान और अधिकार के लिए अकेले संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, जिस दिन किसी बच्ची का बचपन हवस और हिंसा की भेंट नहीं चढ़ेगा—उस दिन हमारी शक्ति-उपासना अपने वास्तविक अर्थ के अधिक निकट होगी।
तब दुर्गापूजा केवल एक पर्व नहीं रहेगी। वह सामाजिक चेतना का उत्सव बनेगी। वह नारी की गरिमा का उत्सव बनेगी। वह उस भारत के निर्माण का संकल्प बनेगी, जहां शक्ति की पूजा भी होगी और शक्ति के जीवंत स्वरूप—स्त्री—का सम्मान भी।
याद रखिए, मां दुर्गा के जयकारे लगाने वाला समाज तभी सच्चा शक्ति-उपासक कहलाएगा, जब उसकी बेटियां भय से नहीं, आत्मविश्वास से सिर उठाकर जी सकेंगी।
इस दुर्गापूजा में मां से केवल समृद्धि मत मांगिए। ऐसा विवेक मांगिए जो अन्याय को पहचान सके, ऐसा साहस मांगिए जो उसके विरुद्ध खड़ा हो सके और ऐसी संवेदना मांगिए जो हर स्त्री में मां, बहन, बेटी देखने से आगे बढ़कर उसे एक स्वतंत्र और समान अधिकारों वाले मनुष्य के रूप में स्वीकार कर सके।
नारी का सम्मान ही शक्ति की सच्ची आराधना है।
लेखक परिचय
- आलोक रंजन झारखंड में लगभग 26 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव रखने वाले पत्रकार, संपादक एवं लेखक हैं। विभिन्न समाचार पत्रों और समाचार चैनलों में कार्य करने के साथ-साथ उन्होंने कई अखबारों एवं पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। वर्तमान में वे नव बिहान मीडिया हाउस का संचालन कर रहे हैं। सामयिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं जनसरोकार से जुड़े विषयों पर उनके विचारोत्तेजक आलेख समसामयिक विमर्श को नई दिशा देने का प्रयास करते हैं।

