Nav Bihan
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हूल की पुकार और इतिहास की खामोशी

इतिहास के पन्नों से झांकती झारखंड की वह क्रांति जिसे भुला दिया गया

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा जाता है, तो उसकी शुरुआत प्रायः 1857 की क्रांति से मानी जाती है। लेकिन इस आधिकारिक इतिहास के पन्नों से एक ऐसी क्रांति लंबे समय तक लगभग गायब रही, जिसने 1857 से दो वर्ष पहले ही अंग्रेजी शासन की जड़ों को चुनौती दे दी थी। यह क्रांति थी 1855 का हूल — संतालों का महान जनविद्रोह, जिसकी गूंज आज भी झारखंड के जंगलों, पहाड़ों और नदियों में सुनाई देती है।

30 जून का हूल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि यह इतिहास से पूछे जाने वाला एक प्रश्न भी है कि आखिर देश के स्वतंत्रता संग्राम की इस महत्वपूर्ण लड़ाई को इतने वर्षों तक हाशिये पर क्यों रखा गया? क्यों उन लोगों के संघर्ष को “स्थानीय विद्रोह” कहकर सीमित कर दिया गया, जिन्होंने जल, जंगल, जमीन और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अंग्रेजी सत्ता और उसके शोषणकारी तंत्र के विरुद्ध हथियार उठाए थे?

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सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में हजारों आदिवासियों ने भाग लिया। उनके साथ चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू जैसे योद्धाओं ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा संभाला। लेकिन इस संघर्ष की सबसे प्रेरक और अक्सर उपेक्षित कहानियों में से एक है वीरांगना बहनों फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू की। कहा जाता है कि इन दोनों बहनों ने युद्ध के मैदान में अंग्रेज सैनिकों का डटकर मुकाबला किया और अपने साहस से यह साबित कर दिया कि स्वतंत्रता और अस्मिता की लड़ाई केवल पुरुषों की नहीं थी, बल्कि महिलाओं ने भी उसमें बराबरी की भूमिका निभाई थी।

इतिहास के पन्नों से झांकती झारखंड की वह क्रांति जिसे भुला दिया गया
इतिहास के पन्नों से झांकती झारखंड की वह क्रांति जिसे भुला दिया गया

 

विडंबना यह है कि भारतीय इतिहास लेखन की मुख्यधारा ने लंबे समय तक ऐसे आदिवासी आंदोलनों और उनके नायकों को वह स्थान नहीं दिया, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। इतिहास अक्सर सत्ता के केंद्रों से लिखा गया और सीमांत समाजों के संघर्ष उसके हाशिये पर छूटते चले गए। परिणामस्वरूप, कई पीढ़ियां यह जाने बिना बड़ी हुईं कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ सबसे संगठित और व्यापक जनविद्रोहों में से एक की शुरुआत झारखंड की धरती से हुई थी।

आज आवश्यकता केवल हूल दिवस मनाने की नहीं, बल्कि इतिहास को नए सिरे से पढ़ने और लिखने की भी है। यह समय उन भूले-बिसरे नायकों को उनके उचित स्थान पर स्थापित करने का है, जिन्होंने अपने खून से प्रतिरोध, स्वाभिमान और अधिकारों की वह कहानी लिखी, जो किसी भी राष्ट्रीय आंदोलन से कम महत्वपूर्ण नहीं थी।

हूल हमें सिखाता है कि जब शोषण व्यवस्था बन जाए, तब प्रतिरोध कर्तव्य बन जाता है। यह केवल अतीत का इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी एक संदेश है—अपने अधिकारों, अपनी पहचान और अपने संसाधनों की रक्षा के लिए समाज को सजग और संगठित रहना होगा।

आज जब झारखंड हूल दिवस मना रहा है, तब यह अवसर केवल श्रद्धांजलि देने का नहीं, बल्कि इतिहास की उस खामोशी को भी तोड़ने का है, जिसने दशकों तक इन वीर सपूतों और वीरांगनाओं के योगदान को पर्याप्त स्थान नहीं दिया।

सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो केवल नाम नहीं हैं, बल्कि वे प्रतिरोध, स्वाभिमान और न्याय की उस परंपरा के प्रतीक हैं, जो झारखंड की आत्मा में आज भी जीवित है। उनके संघर्ष को याद रखना इतिहास के प्रति हमारा दायित्व ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।

 

आलोक रंजन
आलोक रंजन की कलम से .. 

 

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