नगर अध्यक्ष से हेमंत सरकार के सेनापति तक: बहुत खलेगा एक सुलझे रणनीतिकार का यूं खामोश हो जाना
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन से हेमंत सरकार और झारखंड मुक्ति मोर्चा को अपूरणीय क्षति

रिंकेश कुमार (गिरिडीह)
झारखंड की सियासत में रविवार की सुबह एक ऐसा सन्नाटा छोड़ गई, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। हेमंत सरकार के मजबूत स्तंभ और सदन में विपक्ष के तीखे सवालों का उसी अंदाज में जवाब देने वाले मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू अब हमेशा के लिए खामोश हो गए। उनके आकस्मिक निधन ने न सिर्फ गिरिडीह को बल्कि झारखंड मुक्ति मोर्चा और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार को भी गहरा झटका दिया है।


झारखंड आंदोलन के दौर से लेकर सत्ता के गलियारों तक सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक यात्रा संघर्ष, संगठन और रणनीति की कहानी रही। वह उन नेताओं में शुमार थे, जिन्होंने सत्ता को राजनीति का अंतिम पड़ाव नहीं माना, बल्कि संगठन और विचारधारा को अपनी राजनीतिक यात्रा का आधार बनाए रखा।
1989 में शुरू हुआ सफर, नगर अध्यक्ष से प्रदेश की राजनीति तक पहुंचे
सुदिव्य कुमार सोनू ने वर्ष 1989 में एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में झारखंड मुक्ति मोर्चा से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। संघर्ष के दिनों में संगठन के लिए काम करते हुए उन्होंने धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 1992 में उन्हें गिरिडीह झामुमो नगर कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया।
अलग झारखंड राज्य के गठन के बाद भी संगठन के प्रति उनकी सक्रियता कम नहीं हुई। वर्ष 2003 से 2010 तक वे गिरिडीह जिला झामुमो अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बूथ से लेकर जिला स्तर तक संगठन को विस्तार देने के क्रम में वह पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब आते गए।
इसी दौर में दिशोम गुरु शिबू सोरेन और स्वर्गीय दुर्गा सोरेन के साथ उनकी निकटता और मजबूत हुई। संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और लगातार सक्रियता ने उन्हें पार्टी के भरोसेमंद नेताओं की कतार में ला खड़ा किया।
लगातार दो हार के बाद मिली विधानसभा में जीत
राजनीतिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2009 में आया, जब उन्होंने पहली बार गिरिडीह विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन इस हार ने उनके राजनीतिक सफर को थामा नहीं। बल्कि इन चुनावों के दौरान उनका जनाधार लगातार बढ़ता गया और 2014 में वे दूसरे स्थान पर रहे। फिर आया वर्ष 2019। इस चुनाव में सुदिव्य कुमार सोनू ने गिरिडीह विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर विधानसभा का सफर शुरू किया। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी निर्भय शाहाबादी को बड़े अंतर से पराजित किया।
वर्ष 2024 में उन्होंने लगातार दूसरी बार गिरिडीह विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की। इसके बाद 5 दिसंबर 2024 को उन्होंने मंत्री पद की शपथ ली और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कैबिनेट का हिस्सा बने। सरकार में उन्हें एक साथ कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली। उनके पास उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला एवं संस्कृति तथा खेलकूद एवं युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग रहे।

हेमंत सोरेन के भरोसेमंद रणनीतिकार
सुदिव्य कुमार सोनू सिर्फ मंत्री नहीं थे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए वह एक ऐसे सहयोगी और रणनीतिकार थे, जिन पर राजनीतिक परिस्थितियों के कठिन दौर में भरोसा किया जा सकता था। विधानसभा में विपक्ष के हमलों का जवाब देना हो, संगठन से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण फैसला लेना हो, चुनावी रणनीति तैयार करनी हो या फिर गठबंधन के स्तर पर राजनीतिक समीकरण साधना होकृसुदिव्य कुमार सोनू की भूमिका कई मौकों पर महत्वपूर्ण रही। उनकी खासियत यह थी कि वह राजनीति को सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि संगठन, संवाद और रणनीति के स्तर पर समझते थे। यही वजह थी कि पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती गई।
कल्पना सोरेन के गांडेय चुनाव में भी निभाई अहम भूमिका
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जेल जाने के दौरान झारखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। उस दौर में उनकी पत्नी कल्पना सोरेन को गांडेय विधानसभा उपचुनाव में जीत दिलाने की रणनीति तैयार करने में सुदिव्य कुमार सोनू की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। संगठन और चुनावी प्रबंधन की उनकी समझ का इस्तेमाल उस कठिन राजनीतिक परिस्थिति में भी किया गया। बाद में नगर निकाय चुनावों में भी गिरिडीह शहर में पार्टी के राजनीतिक समीकरण को मजबूत करने और शहर की सरकार बनाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
छात्र आंदोलन और सरकार के बीच संवाद की अहम कड़ी
हाल के दिनों में झारखंड की राजनीति को प्रभावित करने वाले श्रच्ैब् और श्रैैब् परीक्षा विवाद के दौरान भी सुदिव्य कुमार सोनू सरकार और आंदोलनकारी छात्रों के बीच संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी बने। छात्रों के आंदोलन और सरकार के बीच बातचीत के लिए बनाई गई कमेटी में वह सरकार की ओर से प्रमुख चेहरों में शामिल थे। सरकार और छात्रों के बीच संवाद कायम करने की कोशिशों में उनकी भूमिका सामने आई।
एक नेता का जाना, एक दौर का थम जाना
सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक यात्रा को देखें तो यह सिर्फ एक विधायक या मंत्री के सफर की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे कार्यकर्ता की कहानी है, जिसने 1989 में एक सामान्य झामुमो कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की और संगठन के विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए मंत्री पद तक पहुंचे। नगर अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, चुनावी योद्धा, विधायक, संगठन के रणनीतिकार और फिर राज्य सरकार में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने वाले मंत्री तक का उनका सफर लंबा और संघर्षपूर्ण रहा।
आज उनकी आवाज सदन में नहीं गूंजेगी। संगठन की बैठकों में उनकी रणनीति सुनाई नहीं देगी। चुनावी मैदान में उनका राजनीतिक कौशल दिखाई नहीं देगा। लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के संगठन और गिरिडीह की राजनीति में उन्होंने जो छाप छोड़ी है, वह लंबे समय तक याद की जाएगी।

