Nav Bihan
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करमा : प्रकृति के साथ झारखंड के रिश्ते का उत्सव

जहां पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं, जीवन का आधार हैं... जहां खेत सिर्फ अन्न नहीं, उम्मीद उगाते हैं... और जहां गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों को आगे बढ़ाने का माध्यम हैं—वहां करमा पर्व जन्म लेता है।

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नव बिहान डेस्क : आज झारखंड की धरती एक बार फिर करमा के रंग में रंगी है। गांवों के अखड़ों में करम डाल स्थापित हो रही है, घर-आंगन सज रहे हैं, जावा की हरियाली मन मोह रही है और मांदर की थाप के साथ करमा गीतों की गूंज वातावरण में फैल रही है। भादो शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला यह पर्व झारखंड की लोक-संस्कृति का ऐसा हिस्सा है, जिसमें प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते की गहरी कहानी छिपी है।

करम डाल में दिखाई देती है प्रकृति की शक्ति

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करमा पर्व में करम वृक्ष की डाल को विशेष महत्व दिया जाता है। परंपरा के अनुसार करम डाल को पूजा स्थल या गांव के अखड़े में स्थापित कर उसकी पूजा की जाती है। यह सिर्फ एक वृक्ष की पूजा नहीं है, बल्कि उस प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है, जिसके सहारे मनुष्य का जीवन और कृषि व्यवस्था टिकी है।

झारखंड की आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति में जंगल, जमीन, जल और जीव-जंतुओं को जीवन से अलग करके नहीं देखा गया। करमा इसी सोच को उत्सव का रूप देता है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार भी करम वृक्ष को उर्वरता, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है।

जावा से जुड़ी है समृद्धि की कामना

करमा पर्व की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं। कई समुदायों में युवतियां और महिलाएं विभिन्न अनाजों को मिट्टी या बालू में उगाकर जावा तैयार करती हैं। धीरे-धीरे अंकुरित होती हरी-हरी जावा की पौध केवल पूजा की सामग्री नहीं होती, बल्कि जीवन, उर्वरता और आने वाली फसल की उम्मीद का प्रतीक बन जाती है।

यही कारण है कि करमा का रिश्ता खेत और किसान से भी उतना ही गहरा है जितना पूजा और परंपरा से।

भाई-बहन के रिश्ते की मिठास

करमा पर्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष भाई-बहन का स्नेह भी है। अनेक स्थानों पर बहनें व्रत रखकर भाइयों के सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं। इस दौरान गाए जाने वाले करमा गीतों में परिवार, खेती, प्रकृति और सामाजिक जीवन के अनेक रंग दिखाई देते हैं।

लेकिन करमा का संदेश केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं है। यह रिश्तों को मजबूत करने और समुदाय को एक साथ जोड़ने का पर्व भी है। कई स्थानों पर ‘सहिया’ जैसी सामाजिक परंपराएं इसी अवसर पर रिश्तों को नई मजबूती देती हैं।

मांदर की थाप पर जागती है लोकसंस्कृति

मांदर की थाप पर जागती है लोकसंस्कृति
मांदर की थाप पर जागती है लोकसंस्कृति

करमा की रात झारखंड के गांवों में एक अलग ही दृश्य दिखाई देता है। अखड़े में लोग जुटते हैं। मांदर और ढोल की थाप शुरू होती है। महिलाएं और पुरुष पारंपरिक गीतों के साथ करमा नृत्य करते हैं और देखते ही देखते पूरा अखड़ा सामूहिक उल्लास से भर उठता है।

करमा नृत्य की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी सामूहिकता है। इसमें व्यक्ति अकेला नहीं नाचता, बल्कि पूरा समुदाय एक लय में जुड़ता है। झारखंड पर्यटन विभाग भी करमा को गीत, नृत्य और सामुदायिक उत्सव से जुड़ा पर्व बताता है।

यही सामूहिकता झारखंड की लोकसंस्कृति की असली ताकत है।

करमा की लोककथा और ‘करम-धरम’

करमा से जुड़ी कई लोककथाएं अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में प्रचलित हैं। इनमें ‘करम’ और ‘धरम’ दो भाइयों की कथा विशेष रूप से कही जाती है। लोकमान्यता में यह कथा कर्म, प्रकृति, जिम्मेदारी और जीवन में संतुलन के महत्व को रेखांकित करती है।

लोककथाओं की यही विशेषता है कि वे केवल अतीत की कहानी नहीं होतीं, बल्कि अपने समय के सामाजिक मूल्यों और जीवन-दर्शन को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं।

आज के समय में करमा का संदेश और भी महत्वपूर्ण

आज जब जंगल लगातार घट रहे हैं, जलस्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है और प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध बदल रहा है, ऐसे समय में करमा हमें अपनी जड़ों की ओर देखने का अवसर देता है।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रकृति हमारे जीवन से अलग कोई बाहरी शक्ति नहीं है। खेत में उगता अनाज, जंगल में खड़ा पेड़, नदी का पानी और मिट्टी की उर्वरता—इन सभी के साथ हमारा जीवन जुड़ा हुआ है।

करमा इसलिए केवल पूजा का दिन नहीं है। यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और उसके संरक्षण के संकल्प का भी अवसर है।

परंपरा से भविष्य तक

करमा की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह परंपरा किताबों में बंद नहीं है। यह गांवों के अखड़ों में जीवित है। यह बुजुर्गों के गीतों में है, युवाओं के नृत्य में है, बहनों की प्रार्थना में है और खेतों की हरियाली में है।

पीढ़ियां बदलती हैं, समय बदलता है, जीवनशैली बदलती है—लेकिन जब तक मांदर की थाप पर करमा गीत गूंजते रहेंगे, तब तक झारखंड की लोकआत्मा भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहेगी।

करमा हमें यही सिखाता है—प्रकृति से प्रेम केवल उसे पूजने में नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाकर जीने में है।

आज जब पूरा झारखंड करमा के उल्लास में डूबा है, तो आइए इस पर्व को केवल एक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि “प्रकृति, रिश्तों, सामुदायिक एकता और अपनी लोकसंस्कृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी के उत्सव” के रूप में भी देखें।

 

“करमा के इस पावन अवसर पर झारखंड की धरती, उसके जंगल, खेत, नदियां और लोकसंस्कृति यूं ही हरी-भरी रहें—यही कामना है।”

 

ITI
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