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श्रीमद भागवत कथा महोत्सव में उमड़ रही है भक्तों की भीड़

कथा के माध्यम से लोगों को भक्ति, वैराग्य और आत्मचिंतन करा एक दिव्य जीवन जीने की मिल रही है प्रेरणा

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गिरिडीह। श्री श्याम सेवा मंडल द्वारा शहर के आईसीआर रोड स्थित श्री श्याम मंदिर के प्रांगण में आयोजित श्री मद भागवत कथा महोत्सव में जहां एक और भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। वहीं राजस्थान से आए प्रसिद्ध कथा वाचक राधेश गौतम जी के द्वारा श्रीमद भागवत कथा के माध्यम से लोगों को भक्ति, वैराग्य और आत्मचिंतन कराकर सभी को एक दिव्य जीवन जीने की प्रेरणा दे रहे हैं ।

इसी क्रम में महोत्सव के तीसरे दिन मंगलवार को वैकुण्ठ एकादशी के पावन मौके पर श्रद्धेय राधेश गौतम जी ने अत्यंत भावपूर्ण एवं प्रेरक रूप से कथा का श्रवण करते हुए उन्होंने भक्ति के 10 सूत्रों को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया और बताया कि सच्ची भक्ति ही जीवन को सार्थक बनाती है। कहा कि कर्मों का हिसाब इसी जन्म में होता है, इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। यह शरीर भी हमारा नहीं है, सब कुछ ईश्वर का है—अतः शरीर की अत्यधिक चिंता छोड़कर आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ना चाहिए। कबीरदास जी के उदाहरण द्वारा उन्होंने समझाया कि संतों के संग से ही जीवन सुधरता है—“संतन के संग लाग रे, तेरी अच्छी बनेगी।”उन्होंने कहा कि जीवन में भक्ति बनी रहे, इसके लिए सत्संग आवश्यक है। अहंकार का त्याग करें, अत्यधिक ममता से बचें और वैराग्य को अपनाएँ—यही भक्ति का सच्चा मार्ग है। उन्होंने भगवान के 24 अवतारों के नामों का वर्णन कर भक्तों को ईश्वरीय लीला और तत्वज्ञान से परिचित कराया।उन्होंने यह भी बताया कि बुरी आदतों को छोड़ने का सबसे सरल उपाय है अच्छी आदतों को अपनाना। जीवन लंबा होना आवश्यक नहीं, बल्कि जीवन दिव्य होना चाहिए—यही मनुष्य जीवन की सच्ची सफलता है। उन्होंने गूढ़ सत्य बताते हुए कहा कि विपत्ति में केवल परमात्मा ही साथ होता है, जबकि संपत्ति में तो सभी साथ दिखाई देते हैं।उन्होंने कथा का श्रवण कर रहे भक्तों को समझाया कि किस प्रकार मनुष्य अपनी 11 इंद्रियों को भगवान के चरणों में समर्पित कर सकता है और अपने जीवन को ईश्वरमय बना सकता है। जीवन कैसा हो और मृत्यु कैसी हो—इस पर भावपूर्ण पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने कहा कि जब प्राण शरीर से निकलें, तो ऐसा भाव हो—

sawad sansar

“इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले,

यमुना जी का तट हो, और श्रीहरि का नाम निकले।”

कथा के उत्तरार्ध में उन्होंने वराह भगवान के अवतार की दिव्य कथा का वर्णन किया और बताया कि किस प्रकार भगवान ने पृथ्वी की रक्षा कर धर्म की स्थापना की।

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