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जन्माष्टमी : कृष्ण को मंदिर में नहीं, अपने जीवन में जन्म देने का पर्व

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आलोक रंजन: जन्माष्टमी केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं है। यह उस दिव्य चेतना के जागरण का पर्व है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर, निराशा से आशा की ओर और स्वार्थ से लोकमंगल की ओर ले जाती है।

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उस समय हुआ, जब अत्याचार अपने चरम पर था, सत्ता निरंकुश थी और सामान्य मनुष्य भय के वातावरण में जी रहा था। ऐसे समय में कृष्ण का अवतरण एक गहरा संदेश देता है —जब अंधकार बढ़ता है, तब प्रकाश की आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ जाती है।

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लेकिन कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश यह नहीं कि हम वर्ष में एक दिन उनका जन्मोत्सव मनाएं। उनका संदेश यह है कि हमारे भीतर का विवेक, साहस, प्रेम और धर्मबोध भी जन्म ले।

यही वह बिंदु है, जहाँ जन्माष्टमी का आध्यात्मिक अर्थ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विचार-दर्शन से जुड़ता है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अध्यात्म को केवल पूजा-पाठ और कर्मकांड तक सीमित नहीं माना। उनका पूरा जीवन इस विचार का प्रमाण रहा कि आत्मपरिष्कार और समाज-परिष्कार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अखिल विश्व गायत्री परिवार भी आध्यात्मिकता को व्यक्ति के चरित्र निर्माण, विचार-परिष्कार और समाज के नवनिर्माण से जोड़ता है।

इस दृष्टि से देखें तो श्रीकृष्ण का जीवन स्वयं एक विराट *विचार-क्रांति* है।

कृष्ण का जन्म—अंधकार के बीच प्रकाश का जन्म

कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। चारों ओर पहरे थे, सामने कंस का आतंक था और परिस्थितियां प्रतिकूल थीं। फिर भी उसी अंधकार में एक ऐसी चेतना ने जन्म लिया, जिसने आगे चलकर अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया और धर्म की स्थापना का मार्ग दिखाया।

यह आज के मनुष्य के लिए भी बड़ा संदेश है।

हम अक्सर कहते हैं—“परिस्थितियां ठीक होंगी, तब हम बदलेंगे।”

कृष्ण का जीवन कहता है—परिस्थितियां बदलने का इंतजार मत करो, अपने भीतर परिवर्तन पैदा करो।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का विचार-दर्शन भी इसी दिशा में मनुष्य को प्रेरित करता है। उनके अनुसार विचार ही मनुष्य के जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। गायत्री परिवार के विचार क्रांति अभियान का मूल सूत्र भी यही है कि विचार बदलेंगे तो व्यक्ति बदलेगा और व्यक्ति बदलेगा तो समाज बदलेगा।

इसलिए जन्माष्टमी का पहला संदेश है— अपने भीतर के अंधकार को पहचानिए और वहीं एक दीप जलाइए।

कृष्ण कहते हैं—भागो मत, कर्म करो

श्रीकृष्ण का सबसे विराट संदेश हमें कुरुक्षेत्र में मिलता है।

अर्जुन युद्धभूमि में खड़े होकर मोह और भ्रम से भर जाते हैं। कृष्ण उन्हें पलायन का रास्ता नहीं दिखाते। वे उन्हें कर्तव्य, विवेक और निष्काम कर्म का मार्ग दिखाते हैं।

गीता का यही संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

समस्या चाहे परिवार की हो, समाज की हो या राष्ट्र की—केवल शिकायत करने से समाधान नहीं होगा। अपने हिस्से का कर्तव्य निभाना होगा।

स्वामी विवेकानंद ने भी आध्यात्मिकता को निष्क्रियता नहीं, बल्कि शक्ति, सेवा और कर्म से जोड़ा। रामकृष्ण परंपरा में “कर्म ही उपासना” और “मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सेवा” का भाव प्रमुख है।

इसलिए कृष्ण हमें सिखाते हैं— धर्म केवल मंदिर में माथा टेकना नहीं है; धर्म उस समय सही के साथ खड़े होना भी है, जब गलत के सामने खड़े होने में जोखिम हो।

कृष्ण की बांसुरी और सुदर्शन — प्रेम भी, प्रतिरोध भी

श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

एक हाथ में बांसुरी है तो दूसरी ओर सुदर्शन चक्र।

बांसुरी प्रेम, करुणा और मधुरता का प्रतीक है, जबकि सुदर्शन अन्याय के विरुद्ध निर्णायक शक्ति का।

यही संतुलन आज के समाज को चाहिए।

केवल कठोरता मनुष्य को संवेदनहीन बना सकती है और केवल भावुकता उसे कमजोर। कृष्ण सिखाते हैं कि हृदय में करुणा हो, लेकिन अन्याय के सामने रीढ़ भी सीधी हो।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवन-दर्शन में भी करुणा, संवेदना और समाज के दुख-दर्द को अपना समझने की भावना प्रमुख रही। गायत्री परिवार के साहित्य में आध्यात्मिक प्रगति को दूसरों के कष्ट को समझने और लोकमंगल से जोड़कर देखा गया है।

यही तो कृष्ण का जीवन-संदेश है— प्रेम करो, लेकिन अन्याय को प्रेम का नाम देकर स्वीकार मत करो।

कृष्ण बाहर नहीं, भीतर जन्म लें

हम जन्माष्टमी पर मंदिर सजाते हैं, झांकियां निकालते हैं, उपवास करते हैं और आधी रात को कृष्ण जन्म का उत्सव मनाते हैं।

यह सब अपनी जगह सुंदर है।

लेकिन एक प्रश्न स्वयं से भी पूछना चाहिए—

क्या मेरे भीतर भी कृष्ण का जन्म हुआ?

जब क्रोध आया, क्या विवेक जागा?

जब लोभ आया, क्या संतोष जागा?

जब किसी कमजोर पर अत्याचार हुआ, क्या मेरे भीतर साहस जागा?

जब किसी दुखी व्यक्ति को मेरी सहायता की जरूरत थी, क्या मेरे भीतर करुणा जागी?

अगर इन प्रश्नों का उत्तर “हां” है, तभी जन्माष्टमी हमारे लिए केवल उत्सव नहीं, आत्मजागरण का पर्व बनती है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने “मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण” को अपने जीवन-संकल्प का केंद्र बनाया।

कृष्ण का जन्म भी इसी अर्थ में हमारे लिए एक प्रतीक बन सकता है— मनुष्य के भीतर श्रेष्ठ चेतना का जन्म।

कृष्ण और विचार क्रांति

आज समाज की अनेक समस्याओं की जड़ बाहर से अधिक मनुष्य के भीतर है—लोभ, अहंकार, हिंसा, ईर्ष्या, नशा, भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता और स्वार्थ।

इन्हें केवल कानून से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए विचार बदलने होंगे।

यही कारण है कि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने आध्यात्मिक साधना को आत्मनिर्माण और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा। गायत्री परिवार का दर्शन भी उपासना, साधना और आराधना के माध्यम से व्यक्ति के परिष्कार तथा लोकमंगल की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

कृष्ण का जीवन भी यही बताता है कि बाहरी क्रांति से पहले भीतर की क्रांति जरूरी है।

कंस केवल मथुरा में नहीं था।

आज का कंस हमारे भीतर का अहंकार भी हो सकता है, हमारा लोभ भी, हमारा क्रोध भी और हमारी स्वार्थपरता भी।

इस जन्माष्टमी हमें अपने भीतर के उस “कंस” को पहचानना होगा।

जन्माष्टमी का सच्चा व्रत

इस वर्ष यदि जन्माष्टमी पर कोई संकल्प लेना हो तो वह केवल एक दिन का उपवास न हो।

संकल्प हो—

एक बुरी आदत छोड़ेंगे।

एक अच्छे विचार को जीवन में उतारेंगे।

किसी एक जरूरतमंद की सहायता करेंगे।

परिवार में प्रेम बढ़ाएंगे।

किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष नहीं रखेंगे।

अन्याय देखकर चुप नहीं रहेंगे।

और प्रतिदिन अपने भीतर के मनुष्य को थोड़ा और बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे।

यही कृष्ण की पूजा होगी।

यही गीता का सम्मान होगा।

और यही उस आध्यात्मिक क्रांति की दिशा होगी, जिसके लिए पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने जीवन भर आत्मनिर्माण और समाज निर्माण का संदेश दिया।

आज कृष्ण को जन्म लेने दीजिए

कृष्ण का जन्म हजारों वर्ष पहले मथुरा में हुआ था। लेकिन कृष्ण की चेतना आज भी जन्म ले सकती है—

किसी ईमानदार व्यक्ति के निर्णय में,

किसी मां की करुणा में,

किसी युवा के साहस में,

किसी गरीब की सहायता करने वाले हाथ में,

किसी अन्याय के खिलाफ उठी आवाज में,

और किसी ऐसे मनुष्य के जीवन में, जो अपने सुख से आगे बढ़कर समाज के बारे में सोचता है।

इसलिए आज जन्माष्टमी पर केवल यह मत पूछिए कि “कृष्ण कब जन्मे थे?”

अपने आप से पूछिए—

“मेरे भीतर कृष्ण कब जन्म लेंगे?”

जिस दिन हमारे भीतर विवेक जन्म लेगा,

जिस दिन कर्म में निष्ठा जन्म लेगी,

जिस दिन हृदय में करुणा जन्म लेगी,

जिस दिन अन्याय के विरुद्ध साहस जन्म लेगा,

और जिस दिन हमारा जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल के लिए समर्पित होगा

उस दिन समझिए, हमारे भीतर कृष्ण का जन्म हो गया।

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