क्या आदिवासी किसी एक राजनीतिक दल की धरोहर हैं? आदिवासियत, अस्मिता और राजनीति के बीच झारखंड की सबसे बड़ी बहस
हर वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। यह दिन आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, अधिकारों और योगदान को सम्मान देने का अवसर है। लेकिन हाल के वर्षों में, विशेषकर झारखंड की राजनीति में, यह दिन केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं रह गया है। यह राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन, वैचारिक दावेदारी और वोट बैंक की राजनीति का भी महत्वपूर्ण मंच बन गया है।


हर वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। यह दिन आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, अधिकारों और योगदान को सम्मान देने का अवसर है। लेकिन हाल के वर्षों में, विशेषकर झारखंड की राजनीति में, यह दिन केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं रह गया है। यह राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन, वैचारिक दावेदारी और वोट बैंक की राजनीति का भी महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
ऐसे में एक सवाल बार-बार उठता है – क्या आदिवासी किसी एक राजनीतिक दल की मिल्कियत हैं?*


इस प्रश्न का उत्तर केवल राजनीति में नहीं, बल्कि भारतीय संविधान, लोकतंत्र और आदिवासी समाज के इतिहास में छिपा है।
आदिवासी पहचान किसी दल की नहीं, एक सभ्यता की पहचान है
आदिवासी समाज का इतिहास किसी राजनीतिक दल के जन्म से सदियों पुराना है। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर और देश के अनेक हिस्सों में आदिवासी समुदायों ने अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा, जीवन-पद्धति और प्रकृति के साथ गहरे संबंध को सदियों तक जीवित रखा है।
बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, फूलो-झानु, चांद-भैरव, तिलका मांझी और जतरा टाना भगत जैसे नायकों का संघर्ष किसी दल के लिए नहीं था। उनका संघर्ष अन्याय, शोषण और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए था।
इसलिए आदिवासियत को किसी एक राजनीतिक विचारधारा या दल के दायरे में बांधना उसके इतिहास और व्यापकता को सीमित कर देता है।
झारखंड में क्यों तेज हो गई है राजनीति?
झारखंड की राजनीति में आदिवासी समाज हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। राज्य की 28 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि अनेक सामान्य सीटों पर भी आदिवासी मतदाता चुनावी परिणाम प्रभावित करते हैं।
इसी कारण लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल आदिवासी समाज को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं। विश्व आदिवासी दिवस, बिरसा मुंडा जयंती, सरहुल और करमा जैसे अवसर अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ राजनीतिक संदेश देने के मंच भी बन गए हैं।
यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है कि दल समाज के बीच जाएं, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी समुदाय पर “एकाधिकार” का दावा किया जाने लगे।

क्या कोई दल आदिवासी हितों का अकेला प्रतिनिधि हो सकता है?
लोकतंत्र में किसी भी समुदाय पर किसी एक राजनीतिक दल का स्वामित्व नहीं हो सकता।
आदिवासी समाज भी किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों और उद्यमियों की तरह विविध विचारों वाला समाज है। उनके भीतर भी अलग-अलग राजनीतिक सोच, सामाजिक प्राथमिकताएं और विकास को लेकर अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं।
यदि कोई यह कहे कि “केवल वही दल आदिवासियों का हितैषी है”, तो यह लोकतांत्रिक बहुलता की भावना के विपरीत होगा।
असल मुद्दे क्या हैं?
राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर यदि आदिवासी समाज की वास्तविक चुनौतियों को देखें, तो वे कहीं अधिक गंभीर हैं—
* गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच,
* स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार,
* युवाओं के लिए रोजगार,
* स्थानीय भाषाओं का संरक्षण,
* जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकार,
* विस्थापन और पुनर्वास,
* महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण,
* पारंपरिक संस्कृति का संरक्षण,
* आधुनिक विकास में समान भागीदारी।
यदि राजनीति इन प्रश्नों पर केंद्रित हो, तो वह आदिवासी समाज के लिए अधिक सार्थक होगी।

आदिवासियत बनाम राजनीतिक प्रतीकवाद
आज कई बार आदिवासियत का उल्लेख केवल चुनावी भाषणों, नारों और पोस्टरों तक सीमित होकर रह जाता है।
वास्तविक आदिवासियत केवल पारंपरिक वेशभूषा पहन लेने या मंच से “जोहार” कह देने से नहीं आती। वह तब दिखाई देती है जब नीति-निर्माण में आदिवासी समाज की भागीदारी बढ़े, उनकी भाषा, संस्कृति और जीवन-दृष्टि को सम्मान मिले तथा विकास योजनाओं में उनकी आवाज़ सुनी जाए।
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी राजनीतिक पसंद चुनने का अधिकार देता है। आदिवासी समाज भी उसी संवैधानिक अधिकार का समान रूप से हकदार है। इसलिए किसी भी आदिवासी नागरिक को उसकी राजनीतिक पसंद के आधार पर “कम” या “ज़्यादा” आदिवासी मानना न तो संवैधानिक दृष्टि से उचित है और न ही सामाजिक दृष्टि से।
विश्व आदिवासी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि आदिवासी समाज केवल एक वोट बैंक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पर्यावरणीय विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आदिवासी किसी एक राजनीतिक दल की मिल्कियत नहीं हैं। वे भारत के नागरिक हैं, झारखंड की आत्मा हैं और अपनी स्वतंत्र राजनीतिक चेतना रखने वाला समाज हैं।
राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन आदिवासियत का मूल स्वर—प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक जीवन, समानता और आत्मसम्मान—किसी दल की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक प्रेरणा है।
विश्व आदिवासी दिवस पर सबसे बड़ा संदेश यही होना चाहिए कि आदिवासी समाज को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम नहीं, बल्कि सम्मान, साझेदारी और न्यायपूर्ण विकास का सहभागी माना जाए। यही लोकतंत्र की सच्ची भावना है।

