जब न्याय की आस में गले में डालनी पड़ी चप्पलों की माला!
तीन साल पुराने जमीन विवाद में सुनवाई नहीं होने का आरोप, डीसी कार्यालय के बाद थाना पहुंचा युवक; अनोखे प्रदर्शन ने व्यवस्था पर खड़े किए सवाल

गिरिडीह/गावां। न्याय की उम्मीद में किसी व्यक्ति को आखिर किस हद तक जाना पड़ सकता है? गावां थाना क्षेत्र के हीराहरी निवासी कुलदीप तुरी का गुरुवार को किया गया विरोध प्रदर्शन इस सवाल को फिर सामने ले आया। गले में चप्पलों की माला, सिर पर पगड़ी और थाना के बाहर धरना—कुलदीप का यह अंदाज भले ही अनोखा था, लेकिन इसके पीछे वर्षों से चले आ रहे जमीन विवाद और कथित तौर पर न्याय नहीं मिलने की उसकी पीड़ा थी।
तीन साल से चल रहा विवाद, अब विरोध का बदला तरीका


कुलदीप तुरी का दावा है कि उसका जमीन विवाद करीब तीन वर्षों से लंबित है। इस दौरान उसने संबंधित अधिकारियों से लेकर जिला प्रशासन तक अपनी शिकायत पहुंचाई। उसका कहना है कि हर बार कार्रवाई और सुनवाई का भरोसा मिला, लेकिन विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकल सका।
जब शिकायतों और गुहार से बात नहीं बनी तो उसने प्रशासन का ध्यान खींचने के लिए विरोध का यह तरीका चुना। गुरुवार को वह गले में चप्पलों की माला पहनकर और सिर पर पगड़ी बांधकर गावां थाना के बाहर धरने पर बैठ गया।
देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जुट गई। किसी के लिए यह प्रदर्शन असामान्य था, तो किसी के लिए यह उस व्यक्ति की बेबसी की तस्वीर थी, जो अपनी बात सुनाने के लिए अब अलग तरीके का सहारा लेने को मजबूर होने का दावा कर रहा है।
डीसी कार्यालय में भी लगा चुका है गुहार

कुलदीप का कहना है कि थाना पहुंचने से पहले वह अपनी समस्या को लेकर डीसी कार्यालय के बाहर भी धरना दे चुका है। उस समय उसे मामले में कार्रवाई और सुनवाई का आश्वासन मिलने का दावा है। लेकिन उसके अनुसार तय समय बीतने के बाद भी विवाद का समाधान नहीं हुआ।
यही वजह है कि अब उसने पुलिस थाने के बाहर बैठकर प्रशासन से अपने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
‘दस्तावेज और जांच रिपोर्ट दबाने’ का आरोप
कुलदीप ने आरोप लगाया कि जमीन विवाद से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और जांच रिपोर्ट को दबा दिया गया। उसका दावा है कि इससे मामले की निष्पक्ष जांच प्रभावित हुई और उसे न्याय नहीं मिल सका।
उसने संबंधित अधिकारियों पर भी मामले में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। हालांकि, ये सभी आरोप कुलदीप के दावे हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
सवाल सिर्फ एक जमीन का नहीं, भरोसे का भी है
किसी जमीन विवाद का कानूनी समाधान समय ले सकता है। जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और न्यायिक प्रक्रिया अपनी जगह जरूरी है। लेकिन सवाल यह भी है कि अगर कोई व्यक्ति लगातार तीन वर्षों तक अपनी शिकायत लेकर अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाता रहे और फिर सड़क पर उतरकर इस तरह विरोध करने को मजबूर होने का दावा करे, तो कहीं न कहीं व्यवस्था की सुनवाई की प्रक्रिया पर सवाल तो उठता ही है।
क्या शिकायतों के निस्तारण की कोई स्पष्ट समय-सीमा नहीं होनी चाहिए?
क्या शिकायतकर्ता को यह जानकारी नहीं मिलनी चाहिए कि उसके मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई?
और अगर दस्तावेज या जांच रिपोर्ट से जुड़ी शिकायत है, तो उसकी निष्पक्ष जांच क्यों न हो?
ये सवाल सिर्फ कुलदीप के मामले तक सीमित नहीं हैं। जमीन विवाद जैसे मामलों में आम लोगों का प्रशासन और पुलिस व्यवस्था पर भरोसा तभी मजबूत होगा, जब शिकायतों पर समयबद्ध, पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई दिखाई दे।
थाना प्रभारी ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
इधर, मामले को लेकर गावां थाना प्रभारी जय प्रकाश कुमार ने युवक के आरोपों को बेबुनियाद बताया है। उन्होंने कहा कि मामला जमीन विवाद से जुड़ा है और इसे नियमानुसार देखा जा रहा है।
यानी एक तरफ शिकायतकर्ता अपने साथ न्याय नहीं होने का आरोप लगाते हुए सार्वजनिक रूप से विरोध कर रहा है, वहीं पुलिस आरोपों को खारिज कर रही है। ऐसे में अब पूरे मामले की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि वास्तविकता क्या है और तीन साल पुराने विवाद की असल अड़चन कहां है।
अब प्रशासन की परीक्षा
कुलदीप का प्रदर्शन फिलहाल इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। गले में चप्पलों की माला शायद उसके विरोध का तरीका है, लेकिन उसके पीछे छिपा सवाल ज्यादा गंभीर है—क्या न्याय पाने के लिए किसी आम आदमी को इतना असहाय महसूस करना चाहिए कि उसे अपनी बात सुनाने के लिए इस तरह सड़क पर उतरना पड़े?
अब निगाहें प्रशासन पर हैं। यदि मामला वास्तव में लंबित है तो उसकी निष्पक्ष जांच, दस्तावेजों की पड़ताल और संबंधित पक्षों की सुनवाई कर समाधान की दिशा में ठोस पहल की जरूरत है।
क्योंकि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि किसी नागरिक को न्याय की मांग के लिए बार-बार विरोध करने की जरूरत ही न पड़े।

