जलवायु परिवर्तन से निपटने में पारंपरिक खाद्य प्रणाली बनेगी सबसे बड़ी ताकत : कृष्णकांत
'जलवायु अखड़ा : रेजिलिएंट झारखंड सम्मिट' में खाद्य संप्रभुता पर मंथन, राज्यपाल ने किया सम्मानित

नव बिहान डेस्क : रांची में आयोजित दो दिवसीय ‘जलवायु अखड़ा: रेजिलिएंट झारखंड सम्मिट’ का सफलतापूर्वक समापन हुआ। सारथी (SAARTHI–Jharkhand Just Transition Network) द्वारा आयोजित इस राज्यस्तरीय सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और न्यायसंगत बदलाव (जस्ट ट्रांजिशन) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक मंथन हुआ। समापन समारोह में झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने अभिव्यक्ति फाउंडेशन के संस्थापक एवं सचिव कृष्णकांत को जलवायु एवं सामुदायिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया।
सम्मिट के दौरान ‘अबुआ मांडी, अबुआ नुतूम (पारंपरिक खाद्य प्रणाली)’ विषय पर आयोजित विशेष प्लेनरी सत्र का संचालन कृष्णकांत ने किया, जिसमें झारखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति, पोषण सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंधों पर विस्तार से चर्चा की गई।


खाद्य संप्रभुता की पुनर्स्थापना पर जोर

सत्र में वक्ताओं ने कहा कि प्रसंस्कृत एवं पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के बढ़ते उपयोग तथा एकल कृषि प्रणाली (मोनोक्रॉपिंग) के कारण पारंपरिक खाद्य विविधता तेजी से समाप्त हो रही है। महिलाओं और बच्चों के बेहतर पोषण, स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय खाद्य प्रणालियों और खाद्य संप्रभुता को पुनर्जीवित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
भोजन के स्रोतों पर पुनर्विचार की आवश्यकता
विशेषज्ञों ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली की अत्यधिक सुविधा कई नई समस्याओं को जन्म दे रही है। ऐसे में लोगों को अपने भोजन के स्रोत, खान-पान की आदतों और स्थानीय खाद्य संसाधनों की ओर दोबारा लौटने की जरूरत है। प्राकृतिक और स्थानीय भोजन को अपनाना स्वास्थ्य और पर्यावरण—दोनों के लिए लाभकारी होगा।
जलवायु संकट से निपटने का टिकाऊ माध्यम है पारंपरिक भोजन

सत्र में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि पारंपरिक खाद्य प्रणालियां केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के दौर में समुदायों की आर्थिक, सामाजिक और पोषण संबंधी सुरक्षा का मजबूत आधार भी हैं। मोटे अनाज, कंद-मूल, जंगली साग-सब्जियां और स्थानीय व्यंजन जलवायु के अनुकूल टिकाऊ खाद्य विकल्प हैं।
43 संगठनों की साझा पहल बनेगी बदलाव की ताकत
सम्मेलन में बताया गया कि सारथी नेटवर्क के अंतर्गत झारखंड के 43 नागरिक समाज संगठन पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु अनुकूल विकास को सरकारी नीतियों एवं योजनाओं से जोड़ने के लिए संयुक्त रूप से कार्य कर रहे हैं। यह नेटवर्क राज्य में नेट-ज़ीरो लक्ष्य और न्यायसंगत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
500 से अधिक प्रतिनिधियों ने साझा किए अनुभव

दो दिवसीय सम्मेलन में विभिन्न सरकारी विभागों, नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, शोध संस्थानों, सामाजिक संगठनों तथा जमीनी स्तर के 500 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े अनुभव साझा किए और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत बनाने पर बल दिया।
हरित और आत्मनिर्भर झारखंड का लिया संकल्प
सम्मेलन का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि झारखंड के पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों और खाद्य संप्रभुता को सशक्त बनाकर ही एक हरित, समावेशी और रेजिलिएंट (भविष्य-सुरक्षित) झारखंड का निर्माण संभव है। वक्ताओं ने कहा कि स्थानीय ज्ञान और समुदाय आधारित विकास मॉडल ही जलवायु संकट का सबसे प्रभावी समाधान बन सकते हैं।

