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सनातन बनाम सेकुलरिज्म : सहिष्णुता नहीं, सजगता का संदेश

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सनातन संस्कृति कभी भी मानव को दुर्बलता की ओर नहीं ले जाती, बल्कि यह उसे सहिष्णुता, आत्मबल और धर्मनिष्ठा का मार्ग दिखाती है। यही वह महान परंपरा है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को

“वसुधैव कुटुम्बकम्” का दिव्य संदेश दिया — अर्थात पूरा विश्व एक परिवार है।

sawad sansar

किन्तु आज विडंबना यह है कि सनातन की सहिष्णुता को सेकुलरिज्म का पर्याय बना दिया गया है,

जबकि दोनों में मूलभूत अंतर है।

सहिष्णुता — ज्ञान, संयम, करुणा और आत्मबल से उपजा दिव्य गुण है।

सेकुलरिज्म — एक व्यवहारिक, तटस्थ और कई बार परिस्थितिजन्य संतुलन मात्र बनकर रह गया है। सनातन धर्म हमें केवल सहना नहीं, बल्कि धर्म के अनुरूप खड़े रहना सिखाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण का स्पष्ट संदेश है “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥”

और यह शाश्वत सत्य—

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

अर्थात, जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि

सहिष्णुता का अर्थ कायरता नहीं है।

सहिष्णुता वही तक उचित है, जहाँ तक वह धर्म, समाज और स्वाभिमान के विरुद्ध न जाए।

रामनवमी : आस्था के साथ शौर्य का भी पर्व :-

*रामनवमी केवल उत्सव नहीं, बल्कि मर्यादा, धर्म और शौर्य का प्रतीक है।*

इस पावन अवसर पर पारंपरिक शस्त्र-कौशल, अखाड़ा परंपरा और अनुशासन का प्रदर्शन हमारी प्राचीन संस्कृति की जीवंत पहचान है।

यह केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि —

1 आत्मसंयम

2 परंपरा के प्रति समर्पण

3 और सांस्कृतिक गौरव

का प्रतीक है।

प्रत्येक सनातनी को अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए और उन्हें

मर्यादित, शालीन और कानूनसम्मत तरीके से अभिव्यक्त करना चाहिए।

बदलता परिदृश्य : महिला शक्ति का उदय :-

आज अनेक शहरों में एक सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है—

अखाड़ा परंपरा में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

जहाँ एक ओर कुछ युवा वर्ग इस शौर्य प्रदर्शन कला को दकियासुनी या* “आर्थोडॉक्स”मानकर,

सेकुलर छवि के दबाव में इससे दूर होते जा रहे हैं,वहीं दूसरी ओर साक्षर, शिक्षित और सजग महिला समाज अपने सबल, सक्षम और आत्मविश्वासी स्वरूप को प्रदर्शित करने के लिए आगे आ रहा है।

यह परिवर्तन केवल भागीदारी का नहीं, बल्कि

👉 मानसिक सशक्तिकरण

👉 सांस्कृतिक पुनर्जागरण

👉 और स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। नारी शक्ति का यह जागरण रामनवमी अखाड़ों की रंगत और गरिमा को और भी निखार रहा है।

निस्संदेह, यह प्रवृत्ति हमारी संस्कृति के लिए किसी अमृततुल्य पुनर्जीवन से कम नहीं है।

स्पष्ट है :-

सनातन हमें सिखाता है—जहाँ आवश्यक हो, वहाँ करुणा रखें…और जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता भी दिखाएँ। यही संतुलन ही सच्चा सनातन है। यही हमारी पहचान है।यही हमारी शक्ति है।

जय श्री राम

रितेश चंद्र।

(डिसक्लेमर आलेख में व्यक्त विचार पूर्ण रूप से इस आलेख के लेखक के निजी विचार हैं. इनसे जुड़े किसी भी विवाद या बहस से नव बिहान का कोई सम्बन्ध नहीं है।)

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