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आदिवासी और आदिवासियत : केवल पहचान नहीं, प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का दर्शन

झारखंड के संदर्भ में आदिवासी अस्मिता, इतिहास, संघर्ष और भविष्य की पड़ताल - हर वर्ष 9 अगस्त को पूरी दुनिया विश्व आदिवासी दिवस (International Day of the World's Indigenous People) मनाती है। वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया। इस दिन का उद्देश्य दुनिया के मूल निवासियों के अधिकारों, उनकी संस्कृति, परंपराओं, भाषाओं और जीवन पद्धति के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है।

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आलोक रंजन
आलोक रंजन

 

हर वर्ष 9 अगस्त को पूरी दुनिया विश्व आदिवासी दिवस (International Day of the World’s Indigenous People) मनाती है। वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया। इस दिन का उद्देश्य दुनिया के मूल निवासियों के अधिकारों, उनकी संस्कृति, परंपराओं, भाषाओं और जीवन पद्धति के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है।

भारत में जब आदिवासियत की बात होती है तो सबसे पहले जिस भूभाग का नाम उभरकर सामने आता है, वह है – झारखंड। यहां आदिवासी समाज केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि इस धरती की आत्मा है। उनकी संस्कृति, प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक जीवन, लोकगीत, लोकनृत्य और संघर्षों ने झारखंड की पहचान गढ़ी है।

sawad sansar

आदिवासियत क्या है?

आदिवासियत जीवन जीने का एक दर्शन
आदिवासियत जीवन जीने का एक दर्शन

आदिवासियत किसी जाति या धर्म का नाम नहीं है। यह जीवन जीने का एक दर्शन है। यह दर्शन सिखाता है कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का आधार है; नदी केवल पानी नहीं, बल्कि संस्कृति की धारा है; पहाड़ केवल पत्थर नहीं, बल्कि पूर्वजों की स्मृतियां हैं। आदिवासी समाज का मूल मंत्र है— “प्रकृति से उतना ही लो, जितनी आवश्यकता हो और उतना ही लौटाओ, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी समृद्ध रहें।”

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब आदिवासी जीवन-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।

झारखंड का गौरवशाली आदिवासी इतिहास

झारखंड का इतिहास संघर्षों का इतिहास है। यहां के आदिवासी समाज ने सदियों तक अपनी जमीन, जंगल और संस्कृति की रक्षा के लिए अनेक आंदोलन किए। तिलका मांझी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सबसे शुरुआती विद्रोहों में से एक का नेतृत्व किया। सिदो-कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में 1855 का संताल हूल दरअसल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम अध्याय था, जिसे इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल। अब वक्त है ये बताने का कि अंग्रेजों की गुलामी से आजादी का पहला युद्ध 1855 में लड़ा गया। बिरसा मुंडा ने “उलगुलान” के माध्यम से अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक जनआंदोलन खड़ा किया तो जतरा टाना भगत ने सत्य, अहिंसा और सामाजिक सुधार का मार्ग अपनाया। इन्हीं संघर्षों की विरासत ने आगे चलकर अलग झारखंड राज्य आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान किया।

झारखंड राज्य निर्माण में आदिवासियत की भूमिका

15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था। यह वर्षों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष का परिणाम था।

झारखंड आंदोलन की मूल भावना थी—

* जल, जंगल और जमीन की रक्षा,

* स्थानीय पहचान का सम्मान,

* प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदाय की भागीदारी,

* और विकास के साथ सांस्कृतिक अस्मिता का संरक्षण।

समृद्ध संस्कृति, जीवंत परंपराएं

समृद्ध संस्कृति, जीवंत परंपराएं
समृद्ध संस्कृति, जीवंत परंपराएं

झारखंड का आदिवासी समाज अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए विश्वभर में जाना जाता है। सरहुल प्रकृति के नवजीवन का उत्सव है। करमा भाईचारे और सामूहिकता का प्रतीक है। सोहराय कृषि और पशुधन के प्रति आभार का पर्व है।

मांदर की थाप, नगाड़ा, बांसुरी, पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, दीवार चित्रकला और प्रकृति से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं आज भी आदिवासी समाज की जीवंत पहचान हैं।

आज की चुनौतियां

समय के साथ आदिवासी समाज अनेक नई चुनौतियों का सामना कर रहा है।

* पारंपरिक भाषाओं का लगातार कम होता उपयोग।

* जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव।

* विस्थापन और पलायन।

* शिक्षा और स्वास्थ्य तक समान पहुंच।

* रोजगार और आधुनिक विकास के बीच सांस्कृतिक संतुलन।

इन चुनौतियों के बीच सबसे बड़ी जरूरत यह है कि विकास और आदिवासी अस्मिता साथ-साथ आगे बढ़ें।

आदिवासी समाज हमें क्या सिखाता है?

आज जब दुनिया टिकाऊ विकास (Sustainable Development) की बात कर रही है, आदिवासी समाज सदियों से उसे अपने जीवन में अपनाए हुए है।

वे सिखाते हैं—

* प्रकृति का सम्मान,

* सामुदायिक जीवन,

* श्रम की गरिमा,

* समानता,

* और संसाधनों का संतुलित उपयोग।

यही कारण है कि आदिवासियत आज केवल झारखंड की नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा बनती जा रही है।

आदिवासी दिवस केवल शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं
आदिवासी दिवस केवल शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं

यह विश्व आदिवासी दिवस केवल शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन का दिन भी है कि क्या हम उन समुदायों का सम्मान कर पा रहे हैं जिन्होंने सदियों से प्रकृति और मानव सभ्यता के बीच संतुलन बनाए रखा।

झारखंड की पहचान उसके खनिजों से जितनी है, उससे कहीं अधिक उसकी पहचान *बिरसा की चेतना, सिदो-कान्हू के संघर्ष, सरहुल की हरियाली, करमा की लय और आदिवासियत की जीवन-दृष्टि* से है।

आइए, इस विश्व आदिवासी दिवस पर संकल्प लें कि विकास की यात्रा में आदिवासी समाज की संस्कृति, भाषा, परंपरा और अधिकारों को समान सम्मान और संरक्षण मिलेगा। यही झारखंड की आत्मा है और यही भारत की सांस्कृतिक शक्ति भी।

ITI
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