Nav Bihan
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आजादी की लड़ाई के दौरान जमुआ के परगोडीह पहुंचे थे महात्मा गांधी, 5 अक्टूबर 1925 को की थी सभा

उपेक्षा का शिकार हो रहा है उनकी सभा के लिए बनाया गया गांधी चबूतरा, नहीं हुआ जिर्णोद्वार तो बच्चों के लिए सिर्फ कहानी मात्र बनकर रह जायेगा गांधी चबूतरा

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नीरज तिवारी गिरिडीह। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर देश को आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी की जयंती पर आज पूरा गिरिडीह ही नहीं बल्कि पूरे देश याद कर उन्हें नमन कर रहा है। आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी का गिरिडीह में भी आगमण हुआ था। जमुआ प्रखंड मुख्यालय से करीब छह किमी दूर परगोडीह गांव में स्थित गांधी चबूतरा आज भी आजादी की लड़ाई की यादों को अपने में संजोए हुए है। यह वहीं स्थान है जहां पर महात्मा गांधी ने 5 अक्टूबर 1925 को सभा कर लोगों को सत्याग्रह और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जागरूक किया था। हालांकि इस चबूतरे को धरोहर के रूप में संवारने के बजाय प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो रहा है। यहां तक कि यह ऐतिहासिक स्थल अब धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रहा है। चबूतरे के आसपास अतिक्रमण और निर्माण के कारण सभा का मैदान भी लगातार सिमटता जा रहा है।

स्थानीय लोगों के अनुसार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के परगोडीह पहुंचने की सूचना मिलने पर मिर्जागंज के मौजी लाल साह समेत अन्य लोगों ने सभा के लिए चबूतरे का निर्माण कराया था। गांधीजी ने ग्रामीणों के आग्रह पर यहां सभा की थी, जिसमें परगोडीह के अलावा मिर्जागंज, खरगडीहा, बदडीहा समेत आसपास के दर्जनों गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। बताया जाता है कि गांधीजी के आह्वान पर सभा में महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपने जेवर तक दान किए थे।

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मिर्जागंज के ख्वाजा परिवार के बुजुर्गों के हवाले से स्थानीय लोग बताते हैं कि गांधीजी की सभा के बाद यह स्थान लंबे समय तक स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों का केंद्र बना रहा। 26 जनवरी और 15 अगस्त को यहां झंडोत्तोलन भी होता था, लेकिन पिछले कई दशकों से ऐतिहासिक चबूतरे और उससे जुड़े मैदान के संरक्षण की ओर न तो जनप्रतिनिधियों ने ध्यान दिया और न ही प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल हुई। यहां तक कि चबूतरे की स्थिति भी जर्जर होती जा रही है। आसपास मकान और खेती होने के कारण वह ऐतिहासिक मैदान भी सिकुड़ता चला गया, जहां कभी हजारों लोगों की सभा हुई थी।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते स्थल का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इस महत्वपूर्ण स्थल को केवल किस्सों में ही जान पायेंगे। ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गांधी चबूतरे की पहचान बनाये रखने के लिए जीर्णाेद्धार कराने, आसपास के क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त कराने और इसे ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित करने की मांग की है।

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