डिजिटल युग, किशोर प्रेम-प्रसंग और पॉक्सो कानून : न्यायिक संवेदनशीलता की बढ़ती आवश्यकता — संवेदनशील पक्ष

मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल संचार के विस्तार ने समाज के व्यवहार और संबंधों की प्रकृति को तेजी से बदल दिया है। इसका प्रभाव किशोरों और बच्चों के सामाजिक एवं भावनात्मक जीवन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आज कई बार किशोरावस्था के भावनात्मक आवेश में बच्चे आपस में निजी संवाद, फोटो या वीडियो साझा कर बैठते हैं। बाद में जब वही सामग्री किसी कारणवश लीक या वायरल हो जाती है, तब मामला कानून और न्यायालय के संज्ञान में आता है और प्रायः ऐसे प्रकरण Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act के अंतर्गत दर्ज हो जाते हैं।
पॉक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण और उत्पीड़न से सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया एक अत्यंत सशक्त और संवेदनशील कानून है। इसकी मूल भावना यह है कि बाल पीड़ित को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान न्यूनतम मानसिक आघात पहुंचे और उसे राज्य तथा न्याय व्यवस्था का पूरा संरक्षण मिले। इसी कारण इस कानून में कई विशेष बाल-अनुकूल प्रावधान किए गए हैं।


इस कानून के अंतर्गत पुलिस को बच्चे का बयान यथासंभव बाल-मित्र वातावरण में दर्ज करना होता है। न्यायिक प्रक्रिया सामान्यतः बंद अदालत (इन-कैमरा) में चलती है ताकि पीड़ित की पहचान और गरिमा सुरक्षित रह सके। मीडिया द्वारा पीड़ित की पहचान उजागर करना भी दंडनीय अपराध है। इसके अतिरिक्त यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि बच्चे को अनावश्यक रूप से बार-बार अदालत में उपस्थित न होना पड़े।
डिजिटल माध्यम से किसी नाबालिग के निजी फोटो या वीडियो का प्रसार एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। यदि कोई व्यक्ति बाल अश्लील सामग्री का निर्माण, संग्रह या प्रसारण करता है, तो उसके विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी कानून के अंतर्गत भी कठोर कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे मामलों में कई वर्षों के कारावास और आर्थिक दंड का प्रावधान है। यदि घटना में ब्लैकमेल, धमकी uhया प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने के तत्व जुड़े हों, तो अतिरिक्त आपराधिक धाराएँ भी लागू हो सकती हैं।
पॉक्सो कानून केवल दंडात्मक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित के पुनर्वास और संरक्षण को भी महत्व देता है। न्यायालय पीड़ित को अंतरिम तथा अंतिम मुआवजा देने का आदेश दे सकता है, जो राज्य सरकार की पीड़ित मुआवजा योजना के अंतर्गत दिया जाता है। यह मुआवजा मानसिक आघात, सामाजिक प्रतिष्ठा की क्षति, शिक्षा पर प्रभाव तथा चिकित्सा या मनोवैज्ञानिक उपचार की आवश्यकता जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाता है।
हालाँकि व्यवहारिक स्तर पर कुछ जटिल परिस्थितियाँ भी सामने आती हैं। कई मामलों में घटना के समय दोनों पक्ष नाबालिग होते हैं और मामला किशोर प्रेम-प्रसंग से जुड़ा होता है, लेकिन जब तक मामला न्यायालय तक पहुँचता है, तब तक एक या दोनों पक्ष वयस्क हो चुके होते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा का दबाव, लंबी न्यायिक प्रक्रिया और मानसिक तनाव के कारण कई बार पीड़ित पक्ष समझौते की ओर झुक जाता है, जबकि पॉक्सो कानून में औपचारिक समझौते का कोई प्रावधान नहीं है।
न्यायिक प्रक्रिया में अभियुक्त के वकील को निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत के तहत जिरह का अधिकार प्राप्त होता है, लेकिन पॉक्सो मामलों में यह अधिकार नियंत्रित और मर्यादित दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है। जिरह के दौरान पीड़ित को अपमानित करना, डराना या उसके चरित्र पर अनावश्यक प्रश्न उठाना स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय का दायित्व है कि वह जिरह की प्रकृति को संतुलित और गरिमापूर्ण बनाए रखे। कई मामलों में न्यायाधीश स्वयं प्रश्नों को नियंत्रित करते हैं या अनुचित प्रश्नों को रोक देते हैं, ताकि बाल पीड़ित की मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
इन परिस्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि न्यायिक प्रक्रिया केवल तकनीकी कानूनी ढाँचे तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें मानवीय संवेदनशीलता और बाल अधिकारों की समझ भी समाहित हो। किशोर प्रेम-प्रसंग और वास्तविक शोषण के मामलों के बीच अंतर को समझना, डिजिटल व्यवहार के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा बच्चों को निजता और साइबर सुरक्षा के प्रति शिक्षित करना भी उतना ही आवश्यक है।
अंततः यह समझना होगा कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं है, बल्कि बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है। जब कानून की शक्ति, न्यायिक संवेदनशीलता और सामाजिक जागरूकता तीनों साथ चलते हैं, तभी इस कानून की वास्तविक भावना प्रभावी रूप से साकार हो सकती है।
ऋतेश चंद्र पूर्व अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति, जामताड़ा
