नगर निगमों के वर्गीकरण के खिलाफ याचिका खारिज, कई लोगों की उम्मीदों पर फिर पानी
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को ठहराया वैध

रांची : झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस एसएन प्रसाद की खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा नगर निगमों को दो वर्गों में विभाजित करने के खिलाफ दायर याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया। अदालत ने पूर्व में मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाया गया।
यह याचिका शांतनु कुमार चंद्रा द्वारा दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके तहत राज्य के नौ नगर निगमों को नगर निकाय चुनाव के मद्देनजर वर्ग ‘क’ और वर्ग ‘ख’ में बांटा गया है। वर्ग ‘क’ में रांची और धनबाद, जबकि शेष नगर निगमों को वर्ग ‘ख’ में रखा गया है।


याचिका में कहा गया था कि संविधान में नगर निगमों के इस प्रकार के वर्गीकरण का कोई प्रावधान नहीं है और राज्य सरकार कार्यपालक आदेश के माध्यम से ऐसा निर्णय नहीं ले सकती। इसे संविधान के विरुद्ध बताते हुए निर्णय को निरस्त करने की मांग की गई थी।
इसके अलावा याचिकाकर्ता ने मेयर पद के आरक्षण पर भी आपत्ति जताई थी। अदालत को बताया गया कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार धनबाद में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग दो लाख है, इसके बावजूद वहां मेयर का पद अनारक्षित रखा गया है। वहीं गिरिडीह में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 30 हजार होने के बावजूद मेयर पद को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
याचिकाकर्ता ने सरकार की इस नीति को असंवैधानिक करार दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने सभी दलीलों को सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया और राज्य सरकार के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
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