नया UGC नियम: शिक्षा में समानता या नए सामाजिक टकराव का आग़ाज़
विश्वविद्यालय परिसरों से सियासत तक गूंजता सवाल


आलोक रंजन


भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर बड़े बदलाव और बहस के दौर से गुजर रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियम — Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations — को लेकर देश भर के विश्वविद्यालयों, छात्र संगठनों और राजनीतिक गलियारों में तीखी चर्चा है। समर्थक इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं, वहीं विरोधी इसे एकतरफा और विभाजनकारी करार दे रहे हैं।
क्या है नया UGC नियम?
UGC के नए नियमों का घोषित उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत और सामाजिक भेदभाव को रोकना और एक समान, सुरक्षित व सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण तैयार करना है।
इन नियमों के तहत:
- हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में Equal Opportunity Centre (EOC) की स्थापना अनिवार्य है।
- Equity Committee और Equity Squad का गठन किया जाएगा, जो भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की निगरानी और जांच करेंगे।
- छात्रों और कर्मचारियों के लिए 24×7 शिकायत निवारण तंत्र उपलब्ध कराना होगा।
- नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों पर फंड रोकने या मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई का प्रावधान है।
UGC का दावा है कि यह व्यवस्था पहले से मौजूद दिशा-निर्देशों को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए लाई गई है।
नियम लागू करने की जरूरत क्यों पड़ी?

बीते वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और आत्महत्या जैसे मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया। कई रिपोर्टों और अदालती टिप्पणियों में यह बात सामने आई कि शिकायतों के निपटारे के लिए स्पष्ट और प्रभावी तंत्र का अभाव है।
UGC का मानना है कि केवल नैतिक अपील या सामान्य गाइडलाइंस पर्याप्त नहीं रहीं, इसलिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा तैयार करना जरूरी हो गया।
दूरगामी प्रभाव: क्या बदलेगा कैंपस का माहौल?
संभावित सकारात्मक असर
- भेदभाव के खिलाफ संस्थागत जवाबदेही तय होगी।
- SC, ST, OBC और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों में सुरक्षा और भरोसा बढ़ेगा।
- देशभर के विश्वविद्यालयों में समान नियम लागू होने से एकरूपता आएगी।
संभावित नकारात्मक असर
- झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की आशंका।
- शिक्षकों और छात्रों में डर और असहजता का माहौल।
- कैंपस में सामाजिक या जातीय ध्रुवीकरण बढ़ने का खतरा।
सवर्ण वर्ग का विरोध क्यों?
नए नियमों के खिलाफ सबसे मुखर विरोध सामान्य (सवर्ण) वर्ग से देखने को मिला है। उनका तर्क है कि:
- नियम एकतरफा हैं और सामान्य वर्ग को संभावित रूप से आरोपी के रूप में देखते हैं।
- शिकायत दर्ज होते ही कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, जिससे “पहले दोषी, बाद में जांच” जैसी स्थिति बन सकती है।
- Equity Committees में संतुलित प्रतिनिधित्व को लेकर स्पष्टता नहीं है।
कई सवर्ण संगठनों ने इन नियमों को “काला कानून” तक कहा है।
क्या हैं सवर्णों की आशंकाएं
- करियर पर असर: झूठी शिकायत से छात्र या शिक्षक का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
- संवाद पर रोक: सामान्य बहस या मतभेद को भी भेदभाव का रंग दिए जाने का डर।
- संवैधानिक समानता पर सवाल: कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत के कमजोर होने की आशंका।
क्या यह मुद्दा भाजपा को राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाएगा?
यह विवाद अब शिक्षा नीति से आगे बढ़कर राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। इस मुद्दे को लेकर अब भाजपा पर आरोप लग रहे हैं। हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं कि UGC के विरोध में मुखर तौर पर कई सवर्ण भाजपाई भी आगे आ रहे हैं। फिलहाल ऐसा महसूस हो रहा है कि ये मामला भारतीय जनता पार्टी के लिए गले की फांस ना बन जाए। इसकी कुछ प्रमुख कारक भी हैं –
- भाजपा का पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।
- उत्तर भारत के कई इलाकों में इस मुद्दे को लेकर नाराज़गी खुलकर सामने आई है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि इससे भाजपा को बड़े पैमाने पर सवर्ण वोटों का नुकसान होगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार संशोधन और संवाद के रास्ते पर चलती है या नहीं।
इधर इस पूरे प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपने अगले आदेश तक रोक लगा दी है. कोर्ट ने प्रथम दृष्टया नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताते हुए कहा कि इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने यूजीसी प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026 के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि नियम स्पष्ट नहीं हैं और छात्रों के बीच भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं, इसलिए इनके संचालन पर फिलहाल रोक लगाई जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब तलब करते हुए सॉलिसिटर जनरल को निर्देश दिया कि वे इस मामले में जवाब दाखिल करें और एक समिति गठित कर नियमों की समीक्षा करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि संशोधित नियम बनने तक मौजूदा रेगुलेशन लागू नहीं रहेंगे।
समाधान टकराव में नहीं, संतुलन में
नया UGC नियम अपने उद्देश्य में सामाजिक न्याय और समानता की भावना से प्रेरित है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में संतुलन और पारदर्शिता बेहद जरूरी है। यदि सभी वर्गों की आशंकाओं को सुना गया और नियमों में आवश्यक सुधार किए गए, तो यह व्यवस्था उच्च शिक्षा को अधिक समावेशी बना सकती है।
अन्यथा, यह सुधार एक ऐसे सामाजिक और राजनीतिक टकराव का रूप ले सकता है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही पीछे छोड़ दे।
